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संपादकीय जे.पी.चौधरी

गरीब प्रधानमंत्री जी के देश में गरीबी शर्मसार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को पूरे दुनिया और देश जानती है कि गरीब परिवार से आते हैं। लेकिन उनके शासन में गरीब और गरीबी शर्मसार महसूस कर रही है। लॉक डाउन के दरमियान मजदूरों को अपमान का घूंट पीकर चरम दुव्र्यवहार का सामना करना पड़ा है। देश के बाहर जो भारतीय फंसे हुए थे उन्हें उडऩ खटोला से लाया गया लेकिन देश के विकास में पसीना बहाने वाला मजदूर वर्ग के लिए सडक़ पर पैदल चलना भी दूभर हो गया। लॉक डाउन की अवधि के दौरान मजदूरों के साथ जो अमानवीय दुव्र्यवहार हुआ उसके लिए देश के प्रधान सेवक को इतिहास में मजदूरों के दमनकारी शासक के रूप में याद रखा जाएगा। संकट के समय जिन्हें भरपेट भोजन कराने की आवश्यकता थी उसके ऊपर पुलिसिया डंडा बरसा। देश के वजीरे आजम नरेंद्र मोदी जी अगर सभी राज्यों उद्योगपतियों एवं फैक्ट्री मालिक को कह देते मजदूरों को पगार नहीं दे लेकिन खाना अवश्य मुहैया कराएं। तमाम औद्योगिक घरानों से कह दिया जाता आपदा के इस समय मजदूरों को खाना देना मैंडेटरी होगा। इतनी सी बात प्रवासी मजदूरों के लिए संजीवनी बन जाता।अगर थोड़ी सी मजदूरों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय दिया जाता तो मजदूरों को देश के रहनुमाओं को लेकर इतिहास के सबसे बड़ा कड़वा सच का सामना नहीं करना पड़ता। प्रधानमंत्री औद्योगिक जगत को गारंटी प्रदान करते कि मजदूरों के ऊपर खर्च की गई राशि को जीएसटी शुल्क में छूट देकर पूरा कर देंगे। प्रधानमंत्री से अपील है कि 72 वर्षों के बाद जनता को प्रधान सेवक मिला। लेकिन प्रधान सेवक के शासनकाल में ही देश के लोगों को जो देखने को मिला, ऐसा मंजर मुल्क के विभाजन के दौरान भी देखने को नहीं मिला होगा। भारतीय लोकतंत्र में इन मजदूरों को भी एक वोट का वह निर्णायक अधिकार दिया गया है जो किसी उद्योगपति को मिला हुआ है। देश की सत्ता में एक मजदूर की भागीदारी भी उतनी ही है जितनी किसी रियासत के पूर्व राजा- महाराजा की। भारत के लोकतंत्र में जनता की सरकार का मतलब गरीब आदमी की सरकार के अलावा और कुछ नहीं होता क्योंकि वह बहुसंख्या में है और जिस व्यवस्था को हमने लागू किया है उसमें ष्बहुमतष् की सरकार ही गठित होती है। इसलिए सबसे पहले यह साफ होना चाहिएं कि मजदूर किसी की दया के मोहताज नहीं हैं बल्कि लॉकडाऊन के चलते सरकारी खजाने पर उसका हक बनता है। मजदूर की मेहनत ही कारखानों में मशीनें घुमाती है और कामगर की लगन ही इसमें हुए उत्पादन को गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतारती है। ये मजदूर ही धरती का सीना चीर कर अनाज उगाते हैं और रेलपटरियों को बिछा कर पूरे देश को जोड़ते हैं।

 

मगर अफसोस कि आज वे ही इन रेल पटरियों पर दम तोड़ रहे हैं। यह कसूर लॉकडाऊन का नहीं बल्कि उस मानसिकता है जो मजदूरों का फैक्टरियों में प्रयोग होने वाले कच्चे माल की तरह देखती है। महात्मा गांधी का यह कहना हर युग में सार्थक रहेगा कि सरकार का हर काम यह ध्यान में रख कर होना चाहिए कि इसका प्रभाव सबसे गरीब आदमी पर क्या पड़ेगा ? क्या गजब का खेल चल रहा है कि मजदूरों को केन्द्र में रख कर सस्ती राजनीतिक बिसात बिछाने की कोशिशें की जा रही हैं। इसे देख कर ऐसा लगता है कि जैसे राजनीतिज्ञों का वैचारिक दिवाला पिट गया है। क्या मजदूर कोई मिट्टी का खिलौना हैं कि जो चाहे जैसे रख दे और जब चाहे दौड़ा दे?

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