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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के द्वारा मनायी गयी हिंदी पखवाड़े का उत्सव समारोह 

नई दिल्ली, (संवाददाता): राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, भारत के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा कि हिंदी भाषा और साहित्य ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, यह आत्मनिरीक्षण करने का समय है कि हम अपनी स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों के बाद अपनी संस्कृति को अपनी भाषाओं के माध्यम से जीवित रखने के मामले में कहां जा रहे हैं। वे हिंदी पखवाड़े के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के 35 विजेताओं को आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों को राजभाषा में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार प्रदान करने के लिए आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। एनएचआरसी अध्यक्ष ने कहा कि हमारी एकता, अखंडता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को जीवित रखना आवश्यक होगा, जब दुनिया में हर महीने एक भाषा और एक बोली के विलुप्त होने की आशंका हो। उन्होंने ज्यादातर अंग्रेजी भाषा में इंटरनेट सहायता प्राप्त संचार उपकरणों के युग में युवा पीढ़ी द्वारा हिंदी की समझ और उपयोग में कमी पर चिंता व्यक्त की। हालांकि, उन्होंने कहा कि विभिन्न विदेशी भाषाओं को सीखने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन चिंता की बात यह है कि ये भाषाएं अपनी संस्कृति में भी लाती हैं, जिसे अगर ध्यान में नहीं रखा गया, तो यह भारतीय संस्कृति और मूल्य प्रणालियों को नुकसान पहुंचाएगी। इस प्रकार हिंदी पखवाड़े का उत्सव इस संदर्भ में प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने कहा कि अगर किसी देश का साहित्य उस देश की भाषा में नहीं लिखा और प्रचारित नहीं किया जाता है, तो उसकी संस्कृति और रीति-रिवाज खत्म हो जाएंगे। इसलिए, सभी मातृभाषाओं और राष्ट्रीय भाषाओं को बनाए रखने और समृद्ध करने की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने यह भी कहा कि ऐसे समय में जब विदेशी देश संस्कृत भाषा में भारतीय साहित्य का लाभ उठा रहे हैं, यह आवश्यक है कि हम भी अपनी भाषाओं के माध्यम से अपनी संस्कृति की रक्षा करें और दुनिया का मार्गदर्शन करें।एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति एम.एम. कुमार, ज्योतिका कालरा, डॉ. डी.एम. मुले, राजीव जैन और महासचिव बिंबाधर प्रधान ने भी सभा को संबोधित किया और उन्हें काम करने और हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया। आयोग के वरिष्ठ अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित थे।

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