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किसानों, युवा और महिलाओं के योगदान का उल्लेख नहीं:   प्रो. शर्मा

पटना, (संवाददाता) : ‘पांच हजार साल पुराने इतिहास सिंधु घाटी लेकर हम 1940-50 के दशक की स्वतंत्रता संग्राम पर चर्चा करते हैं लेकिन गुत्थी सुलझती नहीं है। यह बड़ा प्रश्र है।  यह वह दौर था जिसमें सुभाष चंद्र बोस को पता था कि किसान शेषनाग हैं और जब यह जागेगा तो आजादी स्वतः मिल जाएगी। 1943 में किसानों को जगाने का काम बोस ने किया लेकिन नेहरू ले उड़े। यह वह दौर था, जब सुभाष चंद्र बोस और नेहरू का कद बराबर हो गया था।’ यह बात महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर राघव शरण शर्मा ने हेरीटेज सोसाईटी, पटना एवं  डॉ. बीआर अम्बेडकर  सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू  के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर    चतुर्थ वेबीनार को संबोधित करते हुए कही। ‘1940-50 के दशक की भारतीय स्वतंत्रता का परिदृश्य -सुभाष चंद्र बोस’ विषय पर अपनी शोध आधारित वक्तव्य में प्रो. शर्मा ने कहा कि इस दौर में किसान सभा, महिलायें, मजदूर और युवाओं ने अपना सक्रिय योगदान दिया लेकिन इतिहास में इनका उल्लेख नहीं मिलता है। इस दौर में जनता ने नए नायक पैदा किए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना अंग्रेजों के संरक्षण में हुई थी। ‘1940-50 के दशक की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. शर्मा ने कहा कि इस दौर में हर दल अपनी प्रवृत्ति और प्रतिबद्धता बदल रहा था। नेहरू को आगे कर कांग्रेस को टेकओवर करना चाहते थे। सुभाषचंद्र बोस और गांधीजी में असहमति बनी रही। गांधीजी अपने अनुरूप कांग्रेस वर्किंग कमेटी बनाना चाहते थे लेकिन सुभाषचंद्र बोस ने कहा कि तीन सदस्य आपकी ओर से, तीन मेरी ओर से और शेष तीन आम सहमति से बनाये जाएंगे। अपने हाथ से कांग्रेस की सत्ता जाते हुए देखकर गांधीजी तर्क के स्थान पर अंतरात्मा की आवाज की बात कहते थे। आजादी तो 40 के दशक में ही मिल जाना था लेकिन आपसी झगड़े के कारण सात वर्ष आजादी टल गई। सवाल यह था कि आजादी किनके हाथों में होगी? समाजवादियों ने सुभाषचंद्र बोस को धोखा दिया। उनका कहना था कि अभिनव भारत चरखा नहीं, विज्ञान होगा। उन्होंने कहा कि यह वही दौर था जिसमें औरतों की चेतना विकसित हो चुकी थी और वे जमींदारों को चुनौती दे रही थीं। वे अपने लोकगीतों में सुभाष चंद्र बोस और स्वामी सहजानंद से अलख जगाने और शोषण से मुक्ति की पुकार कर रही थीं। प्रो. शर्मा का कहना था कि ब्रिटिश पूंजी का आज भी हमारे देश में एकाधिकार है। इसमें नौकरशाही शामिल है। उन्होंने कहा कि इतिहास को नए ढंग से लिखने की आवश्यकता है। हेरीटेज सोसाईटी के  महानिदेशक डॉ. अनन्ताशुतोष  द्विवेदी के स्वागत भाषण से वेबीनार का आरंभ हुआ।  प्रो. डी के वर्मा ने विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी और कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत कराया। कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया और आयोजन के लिए हेरीटेज सोसाईटी, पटना और विश्वविद्यालय परिवार का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन हेरीटेज सोसाईटी के डायरेक्टर आजाद हिन्द गुलशन नंदा ने किया। वेबीनार के आखिर में औपचारिक आभार महानिदेशक डॉ. अनन्ताशुतोष  द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम समन्वय विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा एवं योगिक साइंस विभाग के शिक्षक  अजय दुबे ने किया।

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