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आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम संपन्न

पटना, (संवाददाता) : “आजादी का अमृत महोत्सव“ के अवसर पर  हेरीटेज सोसाईटी, पटना, बिहार तथा  डा. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, मध्यप्रदेश  के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक वर्षीय साप्ताहिक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, संगोष्ठी एवं व्याख्यानमाला का प्रथम व्याख्यान कार्यक्रम का स्वागत भाषण हेरीटेज सोसाईटी पटना के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी द्वारा किया गया। आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम की अध्यक्षा कुलपति ब्राउस, प्रोफेसर आशा शुक्ला, ने अपने परिचय वक्तव्य में सभी सम्मानित जनो का स्वागत करते हुए यह बतलाने का प्रयास किया कि आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर हमलोग वर्ष भर प्रत्येक सप्ताह बुधवार को  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियो को इन कार्यक्रम के माध्यम से न केवल याद करेगा बल्कि उनके त्याग और बलिदान की गाथा विस्तृत वर्णन रिपोर्ट के माध्यम से समाज को उपलब्ध भी कराएँगे । 

मुख्य वक्ता प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी, सदस्य, आईसीएचआर, नई दिल्ली, द्वारा इतिहास की समस्याएं- चौरी-चौरा पुनरावलोकन विषय पर अपना वक्तव्य दिया गया। आजादी का यह अमृत महोत्सव एक राष्ट्रीय त्योहार है, जो उन वीर शहीदों को न केवल याद करेगा जिन्होंने अपनी आहुति इस स्वतन्त्रता संग्राम में दी है बल्कि यह कार्यक्रम प्रत्येक भारतीय युवाओं के हृदय में एक प्रेरणा स्रोत बनकर उभरेगा। जहां हमें अपने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सही पक्षों को देखने का अवसर भी प्राप्त होगा। प्रो. चतुर्वेदी ने  चौरी-चौरा  पुनरावलोकन जैसे विषय पर लगातार कई  वर्षों तक गहन शोध, अध्ययन और संकलन का कार्य किया है। भारत की विभिन्न केंद्रीय समितियों के माध्यम से उन्होंने  विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित की हैं। भारतीय इतिहास के संबंध में 9 स्तंभों की गैलरी जो भारतीय इतिहास की रूपरेखा को प्रदर्शित करती है जिसके दो  प्रमुख आधार में  प्रथम इतिहास जो जन सामान्य हेतु उपयोगी हो तथा  दूसरा इतिहास की प्रमाणिकता होनी चाहिए अर्थात साक्ष्य एवं समुचित प्रमाण भी उपलब्ध होने चाहिए, जिसमें प्रश्नों के उत्तर भी प्राप्त हो सके।  इतिहास की प्रमाणिकता का  बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। 

इतिहास की घटना महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन घटना की पटकथा छंततंजपअम बहुत महत्वपूर्ण होता हैं, उन्होंने यह बात अपने वक्तव्य में कई बार उल्लेख किया – हिस्ट्री इज नॉट इंपोर्टेंट बट द नैरेटिव ऑफ द हिस्ट्री इज मोस्ट इंपोर्टेंट। उनके व्याख्यान के दौरान यह देखने को मिला कि भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम अभियान तथा सभी राष्ट्रीय आंदोलनों के साथ ब्रिटिश हुकूमत के कारण बहुत छेड़छाड़ की गई है और जो समाज के मध्य में इतिहास प्रस्तुत है वह उस तरह नहीं है जिस तरह की इतिहास घटित हुआ है।  उन्होंने  इस संबंध में कई बातों का उल्लेख किया । इस व्याख्यान में  चौरी-चौरा आंदोलन में हुई संपूर्ण घटनाक्रम का बड़ा ही सार बोधक और महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा।  यह बताने का प्रयास किया कि चौरी-चौरा आंदोलन  और जलियाबाग आंदोलन को एक साथ देखने की जरूरत है । 

ब्रिटिश काल में काला पानी औरइसी तहर की अन्य सजा कितनों को दी गई और वह सूची कहां है इस संदर्भ में यह देखने को मिला कि भारतीय इतिहास के किसी भी पुस्तक में यह नहीं मिलता कि कितने लोगों को काला पानी आदि  की सजा मिलती है लेकिन यह बात जरूर स्पष्ट हुई कि इस प्रकार की सजाएं उन्हीं को दी गई जिनसे ब्रिटिश लोग डरते थे। इसके संबंध में लंबी विस्तृत चर्चा मिलती है। इन सभी आंदोलनों में बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, सुभाष चंद्र बोस, अरविंद, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे महान क्रांतिवीर सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

उन्होंने आर.सी. मजूमदार द्वारा जो डॉक्यूमेंट प्रस्तुत किया गया था उसका उल्लेख भी किया। अपने यशस्वी वक्तव्य में बाबा राघव दास के महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख भी किया। चौरी-चौरा की जो घटना घटित हुई, उस घटना में सेशन कोर्ट ने एकतरफा 172 लोगों को हत्या के अपराध ने फांसी की सजा सुनाई थी। बाबा राघव दास उस समय जलियांवाला हत्याकांड के सिलसिले में जेल में थे, जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने उस चौकी के सामने जाकर एक जनसभा आयोजित की और जनसभा आयोजित करने के बाद उन्होंने कुछ धन एकत्रित करके चौरी-चौरा आंदोलन में जो सजा सुनाई गई थी उन 172 लोगों के बचाव में इलाहाबाद जाकर पंडित मदन मोहन मालवीय जी से हाई कोर्ट में रिट दायर करने की बात रखी।  पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने रिट दायर की और बाद में हाईकोर्ट ने उन 172 लोगों की फांसी को कम करते हुए केवल 19 लोगों को ही सजा सुनाई, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है।  

हाई कोर्ट मे बहस के दो आधार बने हाईकोर्ट में पहला चौरी-चौराआंदोलन के दौरान जो पुलिस चौकी  में  लगाई गई आग इरादतन नहीं थी और दूसरा यह चौरी-चौरा आंदोलन हुआ क्यों उसकी वजह यह  निकली कि  पुलिस ने निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस वजह से दो-तीन लोग वही शहीद हो गए, इससे आक्रोशित उस भीड़ ने चौकी को जला दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि उस समय की ब्रिटिश काल का जो अंधा कानून चल रहा था, उस के संदर्भ में यह चौरी-चौरा आंदोलन देखने को मिला और बाद में भारत सचिव के द्वारा ऐसे निर्देश भी जारी हुए कि  आंदोलनकारियों को और निहत्थे लोगों के ऊपर फायरिंग ना की जाए। अपने महत्वपूर्ण वक्तव्य में उस समय के महत्वपूर्ण  प्रकाशन कार्यों का उल्लेख भी किया। 5 फरवरी 1921 के असहयोग आंदोलन जो गांधी जी द्वारा चलाया जा रहा था का उल्लेख भी किया।वक्तव्य से यही स्पष्ट हो रहा था कि किसी भी ऐतिहासिक घटना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उस घटना की पटकथा बहुत महत्वपूर्ण है। 

धन्यवाद ज्ञापन हेरीटेज सोसाईटी पटना के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी ने किया। निश्चित रूप से आज का यह उदघाटन सत्र आने वाले कार्यक्रमों को तथा समाज के नौजवानो को हमारे गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम की न केवल याद दिलाएगा, अपितु उनमे राष्ट्र प्रेम की भावना जगाने में सफल होगा। कार्यक्रम में प्रशासनिक संयोजक  अजय वर्मा जी, कुलसचिव ब्राउस, अकादमिक संयोजक प्रोफेसर डी. के वर्मा डीन ब्राउस, डा. मनीषा सक्सेना, डीन ब्राउस, सहायक कुलसचिव सुश्री संध्या मालवीय जी एवं ब्राउस के सभी पदाधिकारी, शिक्षक गण, हेरीटेज सोसाईटी पटना के सम्मानित प्रबुद्ध जन, शोधार्थी एवं विद्यार्थी गण सम्मिलित हुए। कार्यक्रम का संचालन हेरीटेज सोसाईटी पटना के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी द्वारा किया गया। निश्चित रूप से आज का यह उदघाटन सत्र आने वाले कार्यक्रमों को एक उत्साह एवं प्रेरणा दायी सिद्ध होगा। आजादी का अमृत महोत्सव के समन्वयक डा. अजय दुबे एवं डा. मनोज गुप्ता जी द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। कार्यक्रम में तकनीकी सहयोग हेरीटेज सोसाईटी पटना के आजाद हिंद गुलशन नंदा तथा  शंकर गोहिल द्वारा किया गया।

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